आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूटधाम द्वारा सर्वप्रथम आयुष ग्राम चिकित्सालय के नाम से महत्वपूर्ण चिकित्सा सेवा प्रकल्प प्रारम्भ किया गया है। यह सेवा प्रकल्प प्रभु श्रीराम की पावन तपस्थली में आयुष पद्धति से पीड़ित मानव के पीड़ा को निवारण करने की विशुद्ध भावना से नॉन प्रॉफिट आधार पर कार्य कर रहा है।

इस समय देश में एलोपैथिक चिकित्सा की स्थिति बड़ी दयनीय है। चिकित्सा के नाम पर केवल लूट हो रही है, ऐसा कोई भी प्रयास नहीं हो रहा है कि मानव दवा और रोग दोनों से मुक्त हो सके या रोग की जटिलता न बढ़े। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के जनसूचना ढ़ांचे व नवरचना मामलों के सलाहकार सैम पित्रोदा ने भी कहा था कि देश में नर्सिंग होम कल्चर ने चिकित्सा को महँगा कर दिया है। रोगियों को मरने का भय दिखाकर डायलेसिस की जा रही है। उन्‍हें आई.सी.यू., एन.आई.सी.यू., सी.सी.यू. आदि मंहगी जीवन रक्षक प्रणाली में रखा जा रहा है।

यह बात मीडिया में भी कई बार आ चुकी है कि एलोपैथ नर्सिंग होम्स में रोगी को पहले भयभीत किया जाता है ि‍फर इलाज के नाम पर लूट खसोट की जाती है। साधारण बीमारियों को बड़ी बीमारी बताकर रोगियों को आई॰सी॰यू॰ में भर्ती रखा जाता है। नर्सिंग होम में भर्ती कई रोगी तो रोज खून की जाँच, रोज इन्जेक्शन, ड्रिप से अपने को गंभीर मानकर भय से मर रहे हैं इसके लिए नीचे दो उदाहरण ध्यान देने योग्य हैं।

रायबरेली (सरेनी) से एक चिकित्सक अपने १८ वर्षीय पुत्र शशि प्रकाश को नर्सिंग होम में १५ दिन रखकर और वहाँ २ लाख रुपये खर्च करने के बाद इसलिए वहाँ से निकाल कर ले आये कि डॉक्टरों ने ‘मल्टी ऑर्गन फेल्योर’ कह दिया। लगातार ड्रिप चढ़ाने से सूजन बढ़ गयी। रोज खून की जाँच और रोज सोनोग्राफी की जाती। रोगी (बालक) के पेट में कुछ भी नहीं टिक रहा था, उल्टियाँ हो रही थीं। जब कि सत्य तो यह था कि शशि प्रकाश रोग से नहीं दवाइयों के द्वारा मृत्यु की ओर जा रहा था। यहाँ आने पर शशि प्रकाश को भर्ती किया गया, पंचकर्म चिकित्सा और उचित आहार दिया गया। आयुर्वेद की श्रेष्ठ दवाइयाँ दी गयीं। १५ दिन में शशि प्रकाश स्वस्थ होकर चला गया।

एक मिरगी से ग्रस्त युवती की उम्र २० वर्ष, अविवाहित। लगातार ७ वर्ष से एलोपैथिक दवा सेवन कर रही थी और दवा खाते-खाते भी दौरा आ जाते थे। उसकी याददाश्त कम होने लगी, जीवन के प्रति उत्साह घटने लगा। डॉक्टरों ने कहा जीवन भर दवाइयाँ खिलाना होगा। ७ साल बीमारी भोगने के बाद आशा की किरण दिखायी दी। वह आयुष ग्राम चिकित्सालय पहुँची। रोगिणी का परीक्षण किया गया, उसका तो केवल वात प्रवृद्ध था। चिकित्सा प्रारम्भ की गयी और ४० दिनों में ही एलोपैथिक दवा कम होने लगी। तीसरे माह तो उसने स्वयं एलोपैथिक दवा छोड़ दिया। एक वर्ष तक आयुर्वेदिक चिकित्सा लेने के बाद वह मिरगी की बीमारी भूल गयी। अब माँ-बाप ने उसका विवाह कर दिया।

एलोपैथ का ऐसा जाल फैल गया है कि इसमें में दो प्रकार का भय पैदा किया जाता है पहला भय कि यह रोग ऐसा है जो कभी ठीक नहीं होता या इस रोग में जीवन भर दवाइयाँ खानी होंगी नहीं तो मर जाओगे।

मिरगी, थायराइड, ब्लड प्रेशर, मानसिक विकार, हृदयरोग, डिप्रेशन, हिस्टीरिया, गैस आदि तक में जीवनभर दवाइयाँ खिलाई जाती हैं। इन दवाइयों का ऐसा ‘साइड इफेक्ट’ हो रहा है कि व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से टूट रहा है। छोटी-छोटी ओवरी सिस्ट जो आयुर्वेद में दवाइयों से ठीक हो सकती हैं, उनमें ऑपरेशन किया जा रहा है। दमा (श्वास) में, बच्चों तक को इन्हेलर पकड़ाया जा रहा है, विचार करें, एलोपैथी का इतिहास केवल २०० साल पुराना है जब हमारे देश में एलोपैथी नहीं थी तब अच्छे-अच्छे आयुर्वेदज्ञ (वैद्य, हकीम) ही इलाज करते थे और इतनी मौतें नहीं होती थीं तथा व्यक्ति आज से अधिक निरोग, सबल और ऊर्जावान् होते थे। चिकित्सा के नाम पर चल रही इस बेईमानी को समझना चाहिए और सभी को जागरुक करना चाहिए।

आयुष ग्राम ट्रस्टचित्रकूट का यह चिकित्सा सेवा प्रकल्प आयुष ग्राम चिकित्सालय, चित्रकूटधाम भारतीय चिकित्सा पद्धति की आयुर्वेद विधा से कार्य कर रहा है। आयुर्वेद भारत की वह प्राचीन चिकित्सा विधा है जिसका मूलस्रोत ‘अथर्ववेद’ है। आयुर्वेदीय चिकित्सा विज्ञान अत्यन्त व्यापक, गहन, सूक्ष्‍म और वैज्ञानिक है। इसमें स्वास्थ्य की बहुआयामी अवधारणा प्रस्तुत की गयी है। आयुर्वेद एक ऐसा चिकित्सा विज्ञान है जिसमें जैविक, मानसिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों को एकाकार करते हुए चिकित्सा करने की व्यवस्था है। एक श्रेष्ठ आयुर्वेद चिकित्सक और चिकित्सालय का उद्देश्य केवल व्यक्ति को दवा देने तक सीमित नहीं होता, बल्कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य लाभ का अवसर देना, दवा और रोग दोनों से मुक्त करना है। एक श्रेष्ठ आयुर्वेद चिकित्सक सम्पूर्ण चयापचय प्रक्रिया (Metabolism) का ध्यान रखते हुए धातु साम्यता की ओर रोगी को ले जाता है। जिससे रोगी शीघ्र ही रोग और दवा दोनों से छुटकारा पा जाता है।

किन्तु देश का दुर्भाग्य रहा कि लम्बे समय तक परतंत्रता के जंजीरों में जकड़े रहने से देश की संस्कृति, भाषा और चिकित्सा मृतप्राय हो गयी और अच्छे आयुर्वेद चिकित्सकों का अभाव हो गया।

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