२० दिन की चिकित्सा से हार्ट के ऑपरेशन से बच गया ! June 2019..

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किडनी काम करने लगी इन्सुलिन छूटी : आयुष ग्राम चिकित्सालय, चित्रकूट
की चिकित्सा से!!

                                                                              मैं हरिओम अग्रवाल,
लगभग २८-३० वर्ष पूर्व, मुझे हाई ब्लडप्रेशर और डायबिटीज की समस्या हो गयी। बस! यहीं से शुरू हो गया मेरी बर्बादी का खेल जिस दिन मैं काशीपुर में ही एक अंग्रेजी अस्पताल से दवा लेने लगा। परेशानी तो गयी नहीं तो काशीपुर और उधमसिंह नगर के कई अंग्रेजी डॉक्टरों को दिखाया, लेकिन ये डॉक्टर अंग्रेजी दवा की खुराक बढ़ाते गये। डॉक्टर का कहना था कि इसका कोई परमानेण्ट इलाज नहीं है। कुछ साल बाद डॉक्टरों ने इंसुलिन के इंजेक्शन लगाने शुरू कर दिया। समस्या बढ़ने पर दिल्ली के फोर्टिस और अपोलो अस्पतालों में दिखाना आरम्भ कर दिया।

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लेकिन वहाँ भी दवा और इंसुलिन की मात्रा बढ़ती रही। अब किडनी की समस्या पैदा हो गयी। दिसम्बर २०१७ में जाँच कराने पर मेरा ब्लड यूरिया २२० और क्रिटनीन ७ निकला तो अपोलो अस्पताल में डायलेसिस कराने की सलाह दी गयी। लेकिन मुझे मालूम था कि डायलेसिस कोई इलाज तो है नहीं, जीवन भर डायलेसिस पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। इसलिए मैं किडनी के किसी अच्छे आयुर्वेद अस्पताल की इण्टरनेट पर खोज करने लगा। इण्टरनेट पर मुझे आयुष ग्राम (ट्रस्ट), चित्रवूâट के आयुष ग्राम चिकित्सालय के बारे में पता चला कि यहाँ पर न केवल बिना डायलेसिस के किडनी का इलाज होता है, बल्कि यहाँ पर इलाज कराने से ऐसे अनेक रोगी जो डायलेसिस पर निर्भर थे, उनकी डायलेसिस बंद हो चुकी है और वे अब पूरी तरह से स्वस्थ हैं।
मैं २२ जनवरी २०१८ को पहली बार, आयुष ग्राम चिकित्सालय, चित्रवूâट आया। प्राकृतिक वातावरण में बना हुआ यह विशाल परिसर देखकर मेरा मन बहुत प्रसन्न हुआ। अपना रजिस्ट्रेशन कराने के बाद जब मेरा नम्बर आया तो यहाँ के डॉक्टर ने नाड़ी देखी, जीभ देखी, पेट टटोला फिर रिपोर्टें देखकर कहा कि आप चिन्ता न करें, आप यहाँ सही समय पर आ गये हैं, आप जल्द ही ठीक हो जायेंगे। फिर मुझे यहाँ पर भर्ती करके पंचकर्म चिकित्सा और दवायें दी गयीं। रोज डॉक्टर मेरे कमरे में आते, उपचार लिखते, उपचारक उपचार देते। एक सप्ताह में ही मेरा इंसुलिन का इंजेक्शन बन्द करा दिया गया, जबकि मुझे ६० यूनिट इन्सुलिन दी जाती थी, इन अंग्रेजी डॉक्टरों द्वारा। १८ दिन भर्ती रहकर जब मेरी छुट्टी हुई तो मैं बहुत राहत महसूस कर रहा था। दवा चलती रही। ४ माह के बाद मैं १५ दिन के लिए फिर पंचकर्म चिकित्सा के लिए आया। उससे मेरे शरीर में काफी सुधार हुआ। इसके बाद ४-४ माह के बाद पंचकर्म चिकित्सा और दवाओं के सेवन से आज दिनांक ०७.०४.२०१९ को जब मेरी जाँच हुयी तो क्रिटनीन ३.२ और यूरिया ८७ आया। मैं अपने आपको बहुत स्वस्थ और प्रसन्न महसूस कर रहा हूँ। इससे अच्छा मेरे लिए और क्या हो सकता है कि मेरा जीवन बच गया।
लगभग सवा साल में मैंने यह अनुभव किया कि यह ट्रस्ट का अस्पताल है यहाँ सारा चिकित्सा कार्य सेवाभाव से किया जाता है। सारा स्टाफ मेहनत और सेवाभाव से कार्य कर रहा है। इससे होने वाली सारी आय गौ माता की सेवा और संस्कृति तथा संस्कृत के प्रचार-प्रसार में खर्च की जाती है। मैं सभी लोगों को सुझाव देता हूँ कि अगर अंग्रेजी डॉक्टर डायलेसिस की सलाह दें तो डायलेसिस न करा कर सीधे आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रवूâट में आकर दिखायें। मुझे विश्वास है कि आप भी मेरी तरह जल्द ही स्वस्थ होंगे।
हरिओम अग्रवाल
न्यू काशीपुर ड्रग्स सप्लायर, फिनगैन स्ट्रीट
काशीपुर, उधमसिंह नगर (उत्तराखण्ड)
मोबा.नं.- ७३५१२७११००, ९८९७०१२२८०

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गुर्दे की देखभाल

किडनी पेâल्योर के मामलों में आयुष ग्राम (ट्रस्ट) द्वारा संचालित ‘‘आयुष ग्राम चिकित्सालयम्’’  से अच्छा विकल्प अन्यत्र नहीं है।

आयुर्वेद चिकित्सा विधा द्वारा किडनी रोगों को दूर करने में अच्छी सफलता पायी है। जिससे ‘आयुष ग्राम’ चित्रकूट को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान मिली है।

नहीं बदलवानी होगी किडनी, बचेंगे डायलेसिस से!!

‘‘किडनी पेâल्योर रोगियों में स्नेहन, स्वेदन, की तकनीक (युक्ति) से बेहतर परिणाम मिल रहे हैं… यूरिया, क्रिटनीन घट रहे हैं, डायलेसिस भी छूट रही है और किडनी बदलवाले से बच रहे हैं…’’

किडनी का चित्र

३१ वर्षीय श्रीमती आरती द्विवेदी, दिबियापुर जिला- औरेया की किडनी लगातार अंग्रेजी दवाओं के खाते और एबार्शन कराते फेल हो गयी। यूरिया १८८.४ और क्रिटनीन १८.३ हो गया। कानपुर में डायलेसिस शुरू हो गया। डायलेसिस करते-करते आरती द्विवेदी बहुत कमजोर हो गयीं। उनके मरने-जीने की आ पड़ी।

पति शिवकान्त द्विवेदी श्रीमती आरती को लेकर आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रवूâट के ‘आयुष ग्राम  चिकित्सालयम्’ आये।

केवल ४ सप्ताह का समय लगा ‘आयुष ग्राम चित्रवूâट’ में रखकर इलाज किया गया, वह डायलेसिस और किडनी ट्रान्सप्लान्ट से बच गयी।

१८ वर्षीय अजीज अहमद को बिंवार (हमीरपुर) उ.प्र. से लेकर उनके पिता १५ अक्टूबर २०१८ को – आयुष ग्राम ट्रस्ट के चिकित्सालय चित्रवूâट आये। उसकी भी कानपुर में डायलेसिस चल रही थी। डॉक्टर कह रहे थे कि किडनी बदलनी पड़ेगी।  पर किडनी बदलना कोई कपड़े बदलने जैसा सरल काम तो है नहीं। फिर बदली हुई किडनी कुछ साल में खराब हो जाती है और रोगी फिर डायलेसिस में आ जाता है।

यहाँ आने पर खून जाँच हुयी तो यूरिया १०८.९, क्रिटनीन ११.९ आया।

अजीज के पिता इमाम हुसेन को भारतीय चिकित्सा विज्ञान की तकनीक और प्रभाव की जानकारी दी गयी और यह बताया गया कि यह ऐसी तकनीक है कि रोगी में स्टेमिना (बल) भी आता है, खून में बसा यूरिया, क्रिटनीन बाहर होता है, किडनीr फिर से काम करने लगती है। यह बहुत ही सफल तकनीक है और आरामदायक चिकित्सा भी। किसी भी प्रकार के सुई, काँटे छूरी या ऑपरेशन का प्रयोग नहीं होता केवल दवाओं का प्रयोग होता है। अजीज को ‘आयुष ग्राम चिकित्सालय चित्रवूâट’ में रखा गया और भारतीय चिकित्सा विज्ञान की तकनीकि स्नेहन,स्वेदन, विरेचन, बस्तियाँ आदि युक्तिपूर्वक दी गयीं, भोजन में पेया, विलेपी दी जाती रही।

४ सप्ताह तक अजीज अहमद की ‘आयुष ग्राम’ में चिकित्सा की गयी और क्रिटनीन, यूरिया नार्मल हो गया। ये तो सन्दर्भ मात्र है। प्रत्येक रोगी में अलग-अलग परिणाम आते हैं पर जितने अच्छे परिणाम आते हैं वे अभिलिखित करने योग्य हैं। सफल केसों का प्रकाशन आई.एस.एस.एस.एन. रजिस्टर्ड जनल्र्स में होता है।

‘‘भारतीय चिकित्सा विज्ञान’’ की यह तकनीकि —

यह तकनीकि भारतीय चिकित्सा विज्ञान की है जिस पर हमने २००६ से कार्य है।

दरअसल ‘किडनी पेâल्योर’ का मूल कारण शरीर का कुपोषण, अतिमानसिक व शारीरिक श्रम, दूषित, गलत खान-पान और गलत चिकित्सा जिससे शरीर की वायु और अग्नि (फायर- इम्यून सिस्टम) की भूमिका होती है। फिर चयापचय प्रणाली में बिगाड़ की शुरू हो जाता है। जिससे मधुमेह, ब्लडप्रेशर आदि हो जाते हैं और किडनी पेâल हो जाती है।

वैज्ञानिक रिसर्चों में भी यही बात सामने आयी है कि किडनी रोगी को अंग्रेजी अस्पताल/डॉक्टर खान-पान की बन्दिशें लगा देते हैं। अमेरीकी वैज्ञानिक भी गाय के दूध और घी को उत्तम पोषण,  जीवनीय और बलप्रद मान चुके पर भारत के अंग्रेजी डॉक्टर उसे तो छूने से मना कर देते हैं, नमक और मसालों पर पूरी पाबन्दी लगा दी जाती है, केवल उबली सब्जियाँ, सूखी रोटियाँ दिया जाता है। जिससे कुपोषण और बढ़ता है परिणामत: मर्ज और बढ़ने लगता है।

जबकि नेशनल किडनी फाउन्डेशन एण्ड दि एकेडमी ऑफ न्यूट्रीशियन डाइटिक्स ने भी अपने रिसर्च में कहा है कि किडनी के मरीजों में ‘न्यूट्रीशियन थैरेपी’ (पोषण चिकित्सा) अवश्य दी जानी चाहिये। पोषण चिकित्सा के प्रभाव से गुर्दे की बीमारी का प्रभाव घट जाता है चाहे वह किसी भी स्टेज की बीमारी हो।

‘भारतीय चिकित्सा विज्ञान’ में भी पोषण पर ध्यान देने की बात कही गयी है। स्नेहन तकनीकि की प्रधान मात्रा को ‘बल्या’ पुनर्नवकरी ((Rाुाहीaूग्न) बताया है।

‘भारतीय चिकित्सा विज्ञान’ में स्नेहन, स्वेदन के साथ-साथ शोधन (ँग्द झ्ल्rग्fग्ी) और शमन चिकित्सा से शरीर से यूरिया, क्रिटनीन जैसे जहरीले पदार्थ बाहर होते हैं तथा शरीर में इन जहरीले तत्वों का निर्माण भी कम होने लगता है। शरीर की दुर्बलता दूर होती है तथा किडनी जैसा अवयव निरोग होता है।

                इस तकनीकि प्रक्रिया के फायदे-

आयुष ग्राम चिकित्सालय चित्रवूâट में इस तकनीकि की दो सिटिंग दी जाती हैं। पहली सिटिंग २ या ३ सप्ताह की होती है। इस दौरान आयुष ग्राम चिकित्सालयम्’ में रोगी को रखा जाता है। यहाँ के डॉक्टर/नर्स सतत निरीक्षण कर अपनी निगरानी में औषधियाँ, पोषक (स्नेहन, स्वेदन, पंचकर्म तथा खान-पान भी) देते हैं। हर सप्ताह खून की जाँच की जाती है। अधिकांश किडनी रोगियों में पहले सप्ताह ही क्रिटनीन यूरिया घटने लगता है।

१५ दिन की दूसरी सिटिंग फिर एक या डेढ माह बाद देते हैं। लाभ होने के बाद का किसी भी रोगी का  जीवन मरीज द्वारा किये जा रहे परहेज और स्वास्थ्य की गम्भीरता पर निर्भर होता है।

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मेरी माँ हार्ट के ऑपरेशन से बची और अभी जीवित है!!

विनोद कुमार गर्ग

गौशाला रोड, गढ़िया टोला वार्ड नं. ०३

शिव मंदिर के पास सतना (म.प्र.)

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सन् २०१० में मेरी माँ कमला देवी उम्र ६० साल के सीने में दर्द हुआ, चलने में सांस पूâलने लगी। हम जबलपुर लेकर भागे, वहाँ सिटी हॉस्पिटल में एंजियोग्राफी हुयी। वहाँ ७०³ ब्लॉकेज बताया। डॉक्टरों ने डरवाया तो हमने एंजियोप्लास्टी करा दिया और स्टेंट डलवा दिया। लेकिन २ साल बाद फिर सांस पूâलने लगी, सीढ़िया नहीं चढ़ पातीं। तो फिर सिटी हॉस्पिटल जबलपुर ही ले गये वहाँ जाँच किया और कहा कि अब हार्ट का बाल्व लीक है तथा थिकनेस आया। इन अंग्रेजी डॉक्टरों ने कहा कि ऑपरेशन कराना पड़ेगा, नहीं तो मरीज खत्म हो जायेगा हमने जबलपुर के डॉक्टरों से कहा कि अभी आपने एंजियोप्लास्टी की तो उससे भी कोई फायदा नहीं मिला। तो क्या गारण्टी है कि इस ऑपरेशन से ठीक हो जाये। उन्होंने कहा कि कोई गारण्टी नहीं। हम परेशान तो थे ही अब माता जी की हार्ट से कोई छेड़छाड़ नहीं कराना चाहते थे। चाहे जो हो जाये। तभी हमें एक मित्र से भगवान् श्री राम की तपोभूमि चित्रवूâट में स्थापित आयुष ग्राम ट्रस्ट की जानकारी मिली। यह बताया गया कि यहाँ बिल्कुल आडम्बर नहीं है। क्योंकि ट्रस्ट का अस्पताल है, यहाँ के डॉक्टरों की यह भावना है कि रोगी को ऑपरेशन से बचाया जाय और रोगी जीवन जिये।

 

बस! मैं अपनी माँ को ७ सितम्बर २०१६ को लेकर आयुष ग्राम (ट्रस्ट) चित्रवूâट गया। वहाँ पर्चा बना फिर डॉ. त्रिपाठी जी ने देखा और पूरा चेकअप कर नाड़ी इत्यादि देखकर डॉ. वाजपेयी जी के ओ.पी.डी. में भेज दिया। उन्होंने देखा, कुछ जाँचे करायीं, फिर कहा कि आप निश्चिन्त रहें सब ठीक हो जायेगा। इसके बाद उन्होंने जैसा कहा वैसा हमने किया। फिर दवायें चलती रहीं। २ साल लगातार दवाइयां चलीं, माता जी की सारी समस्यायें खत्म हो गयी। २ साल बाद हमने फिर एंजियोग्राफी करायी तो वहीं अंग्रेजी डॉक्टर जो ऑपरेशन के लिये कह रहे थे देखकर बोले कि अब कोई ऑपरेशन की जरूरत नहीं। सब कुछ नॉमर्ल है।

मैं सभी से कहता हूँ कोई भी आकर मेरी माँ को देखे जिसे ये अंग्रेजी डॉक्टर कह रहे थे कि ऑपरेशन नहीं कराओगे तो खत्म हो जायेंगी। वे आज भी जीवित हैं हमें आर्शीवाद दे रही हैं। मैं सभी से कहता हूँ कि आप कभी हार्ट के मामले में आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रवूâट पहुंचे। जैसी वे सलाह दें वैसा करें पूरे कोर्स तक दवा करें आप भी माँ की तरह ऑपरेशन से बचेंगे। मैं तो सभी को बताता हूँ।

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आयुष ग्राम (ट्रस्ट) चिकित्सालय, चित्रकूट  ने बचा लिया हार्ट की सर्जरी से!!

हम बचायेंगे गरीबों को हार्ट की सर्जरी/स्टेंट से!!

श्याम प्रकाश शुक्ल अहिरगुँवा, पन्ना (मध्य प्रदेश) मोबा.नं.- ०९३९९९६४१५२

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२५ अक्टूबर २०१८ को एक भण्डारे में मैं भोजन करने गया, प्रसाद खाकर सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था कि अचानक छाती में दर्द हुआ और बहुत जोरों से खाँसी आने लगी। चेहरा लाल पड़ गया और आँखें जैसी निकल आयीं। कुछ लोग वहाँ से मुझे घर लेकर आये फिर वहाँ से पन्ना के जिला अस्पताल लेकर गये। देखते ही वहाँ के डॉक्टरों ने हार्ट अटैक घोषित किया और भर्ती कर लिया। फिर पेट में एक बहुत ही गहरा इंजेक्शन दिया इसके बाद उन्होंने मेडिकल कॉलेज रीवा के लिये रिफर कर दिया। २५ तारीख को ही रात में मेरा बेटा अग्निमित्र मुझे सतना के एक नर्सिंग होम ले गया। तमाम जाँचें हुयी और एक्यूट कॉरनरी सिण्ड्रोम मायोकार्डियल इंप्रâाक्शन घोषित किया गया।

मुझे पूरी रात आईसीयू में रखा तथा डॉक्टरों ने मेरे परिवार को बताया कि ९० प्रतिशत हार्ट में ब्लॉकेज है, स्टेंट डालना पड़ेगा, यह सुनकर अब हमारे परिवार वाले परेशान होकर इस प्रयास में लग गये कि ऑपरेशन या स्टेंट से वैâसे मैं बचूँ। क्योंकि स्टेंट डलवाने के बाद भी व्यक्ति हार्ट का रोगी और कमजोर बना रहता है। तभी हमें आयुष ग्राम ट्रस्ट, चित्रवूâट का पता चला और २६ अक्टूबर को ही मुझे आईसीयू से निकालकर आयुष ग्राम ट्रस्ट के चिकित्सालय, चित्रवूâट में लाया गया, यह ट्रस्ट का अस्पताल है इसलिए यहाँ न तो आडम्बर है न ही अनावश्यक जाँचें करायी जातीं, न ही अनावश्यक खर्च कराया जाता। जब मैं यहाँ आया तब भयंकर साँस पूâल रही थी, चलने की तो कोई हिम्मत नहीं थी। जब मुझे आईसीयू से निकाला जा रहा था तो ये अंग्रेजी डॉक्टर इस प्रकार डरवा रहे थे कि आप जिम्मेदार हैं, कुछ भी हो सकता है। मैं आयुष ग्राम चिकित्सालय, चित्रवूâट में जैसे ही आया तो सर्वप्रथम एक ऐसी आयुर्वेद रसौषधि मुझे दी गयी जिससे मुझे ऐसा लगने लगा कि मानो मुझे कोई बीमारी ही न हो।

अब मेरा दूसरे दिन से विधिवत् उपचार शुरू हुआ। हृदय वस्ति, निरूह बस्ति, अभ्यंग और भी कई प्रकार के उपचार दिये जाने लगे। यहाँ कोई आडम्बर नहीं, भोजन में सादा भोजन दिया जाने लगा। कोई चीर-फाड़ नहीं और न ही कोई इंजेक्शन गोलियाँ। मुझे २४ घण्टे में ही फर्वâ लगने लगा और यह विश्वास होने लगा कि जीवन बच जायेगा। १० दिन की चिकित्सा से मैं खूब सीढ़ियाँ चढ़ने उतरने लगा और आराम से घूमने-फिरने लगा तथा एक फलांग तक चलने लगा। अब धीरे-धीरे मेरा वजन भी घटने लगा। दो सप्ताह बाद तो मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं मानो बीमार ही नहीं हूँ। जहाँ अंग्रेजी डॉक्टर मुझे कहते थे कि टट्टी जाते समय जोर न लगाना नहीं हार्ट हटैक हो जायेगा, चलना-फिरना नहीं तो कुछ भी हो जायेगा, वहीं मुझे यहाँ बिना डरवाये मेरी चिकित्सा की जाती रही और ४ सप्ताह में मैं इस तरह हो गया कि जैसे मैं आज के २० साल पहले था। मेरा वजन ८८ किलो से घटकर ७७ किलो हो गया।

१ माह बाद मैं दूसरी सिटिंग के लिये आयुष ग्राम चिकित्सालय चित्रवूâट गया। उस समय मुझे रखकर स्नेहपान कराया गया। साथ ही स्वेदन और वस्तियां। इस चिकित्सा से मुझे एक दिन ३-४ पतले दस्त हुये और भूख खुलकर लगी। विश्वास करें उस दिन से मुझमें एक नया बल मिलने लगा जो थोड़ा सांस पूâलती थी वह भी ठीक हो गयी। अब मै दवा लेकर घर आ गया। आज मैं पूरी तरह से ठीक हूँ। ऑपरेशन और स्टेंट डलवाने से बच गया। १ माह में जाकर दवा लाता हूँ और दिखाता हूँ। मैं देखता हूँ कि हार्ट में स्टेंट के कुछ दिन बाद दवा खाते-खाते किडनी में प्रभाव पड़ जाता है या दिमागी कमजोरी आ जाती है फर आयुष चिकित्सा से पूर तरह नयापन आ गया। मैंने पूरी तरह से चिकित्सालय और चिकित्सक की नियमों का पालन किया और आज जाते समय मुझे खुशी है कि मुझे केवल जीवनदान ही नहीं मिला बल्कि मैं चीर-फाड़ और तमाम अंग्रेजी दवाओं के आडम्बर से बच गया। मैं सभी से कहना चाहता हूँ कि जब भी आपको डॉक्टर हार्ट की समस्या बताकर ऑपरेशन की बात करे तो आप आयुष ग्राम ट्रस्ट, चित्रकूट के चिकित्सालय पहुँचें।

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