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बुद्धि का पूरा सही उपयोग करना चाहिए!!

‘बुद्धिर्यस्य बलं तस्य’ ऐसा नीतिशास्त्र का वचन है कि सच में वही बलवान् जिसने बुद्धि का सही उपयोग किया। बुद्धि जब सात्विकता से ओत-प्रोत रहती है तभी उसका सही उपयोग हो पाता है तभी वह ‘विवेक’ बन जाती है।

आज जितने भी हमें सुखी-दु:खी, सफल-असफल, पुण्यात्मा-पापी, धनी-निर्धन दिखायी पड़ते हैं, यह सब अन्तर शरीरों का नहीं होता। दो हाथ, दो पैर, आँख, कान, नाक आदि सब में होते हैं किन्तु जो अन्तर है वह बुद्धि के कारण है। जब बुद्धि तमोदोष से घिरी रहती है तो वह आलस्य प्रमाद और व्यर्थ की निद्रा में रहता है और उससे उबर नहीं पाता, उसे सही मानता चला जाता है तथा उसे हर जगह नकारात्मकता और विपरीतता ही दिखाई पड़ती है अत: पतन होता जाता है।

यही बुद्धि जब रजोदोष से घिरी रहती है तब सही गलत, कर्तव्य अकर्तव्य, धारणीय अधारणीय को यथार्थता में नहीं समझता, एकदम विचलन में रहता है, किन्तु जिस मानव में यह देखा जाय कि यह प्रवृत्तिमार्ग पर है अर्थात् गृहस्थ मार्ग में रहते हुए फल और आसक्ति को छोड़कर लोक शिक्षा और लोक कल्याण के लिए कार्य कर रहा है अथवा निवृत्तिमार्ग पर है कि देहाभिमान को त्याग संसार से उपराम होकर परमात्मा से एकीभाव होकर विचरण कर रहा है, गलत, सही, कर्तव्य, अकर्तव्य का विवेक रखता है, क्या करने से भय उत्पन्न होगा, क्या करने से निर्भयता रहेगी, क्या करने से बन्धन रहेगा और क्या करने से मुक्ति रहेगी ऐसा विवेक है तो वह सात्विक बुद्धि युक्त है, यही बुद्धि उन्नति दायक, सुख दायक, सफलतादायक, पुण्यप्रदायक और सम्पत्तिदायक होती है।

तभी तो भगवान् ने अर्जुन से (गीता ३/४२-४३ में) कहा है कि स्थूल शरीर से इन्द्रियाँ बलवान् और सूक्ष्म हैं, इन्द्रियों से मन और मन से बुद्धि श्रेष्ठ है और बुद्धि से आत्मा श्रेष्ठ है इसलिए अर्जुन! तुम बुद्धि को, आत्मज्ञान में लगाकर महान् शत्रु काम को नष्ट कर डालो, कामनाओं के नष्ट हो जाने से शांति प्राप्त हो जाती है। इसलिए बुद्धि को सात्विक मार्ग में ले जाते हुए खूब उन्नति प्राप्त करना चाहिए।

ध्यान रहे कि हमारी बुद्धि सात्विकता की ओर जाती है साधना, संयम, तप, जप, सदाचार, अच्छे साहित्य के स्वाध्याय, मनन और सात्विक संयमित सामयिक आहार से। ये बुद्धि विशोधक उपाय हैं। इसीलिए चरक जैसा महान् वैज्ञानिक निर्देश देता है-

‘‘शस्त्र शास्त्र और जल इनमें पात्र के अनुसार गुण दोष आते हैं इसलिए निराकरण कर्ता (चिकित्सक) को श्रेष्ठ पात्रता की प्राप्ति के लिए बुद्धि का विशोधन करते रहना चाहिए। (च.सू.९/२०)’’