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आत्मोन्नति, आत्मनिर्माण-प्राणबल बढ़ायें : अद्भुत उपलब्धियाँ होंगी आपके हाथ में!!

जब विश्वामित्र जी राजा थे तब वे एक बार अपनी सेना, मंत्रियों सहित महर्षि वसिष्ठ जी के आश्रम में पहुँचे। महर्षि वसिष्ठ ने उनका भव्य और दिव्य स्वागत, सत्कार किया, भोजन कराया, राजा विश्वामित्र ने महर्षि वसिष्ठ जी से आश्रम की ऐसी सम्पन्नता का रहस्य पूछा, महर्षि वसिष्ठ जी ने इस सम्पन्नता का मूल आधार गोसेवा और अपने गोधन को बताया।

अब राजा विश्वामित्र को लालच आ गया और वे महर्षि वसिष्ठ के आश्रम में जो श्रेष्ठ गाय थी उसी को बलपूर्वक ले जाने लगे, तब वसिष्ठ जी और उस गौ माता ने भी कड़ा विरोध किया।

तब विश्वामित्र ने महादेव जी से प्राप्त शस्त्रास्त्रों से वसिष्ठ जी के आश्रम को ही तहस-नहस कर डाला और आगे आश्रम वासियों का विनाश करने लगे। तब वसिष्ठ जी ने आश्रम वासियों को आश्वस्त किया और विश्वामित्र का सामना करते हुए कहा-

क्व च ते क्षत्रियबलं क्व ब्रह्मबलं महत्।
पश्य ब्रह्मबलं दिव्यं मम क्षत्रियपांसन
वा.रा. १/५६/४।।

अरे! विश्वामित्र तुम तो अब क्षत्रिय धर्म से विमुख हो गये हो, क्षत्रियकुल के कलंक हो गये हो, तुमने मेरे ऐसे आश्रम को नष्ट कर दिया जिसे मैंने दीर्घकाल से पाला-पोसा था, जहाँ से लोकहित की गतिविधियाँ संचालित होती थीं। (वा.रा. १/५५/७)

कहाँ तुम्हारा भौतिकता से ओत-प्रोत क्षत्रियबल, कहाँ मेरा महान् दिव्य आध्यात्मिक ब्रह्मबल। अब तुम मेरा आध्यात्मिक ब्रह्मबल देखो।

इसके बाद भी विश्वामित्र ने हजारों अस्त्र-शस्त्र वसिष्ठ जी पर चलाये किन्तु वसिष्ठ जी अपने ब्रह्मबल से उनका शमन कर दिया।

महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं कि उस समय ब्रह्मबल से वसिष्ठ जी के समस्त रोमवूâपों से किरणों की भाँति धूमयुक्त आग की लपटें निकल रहीं थीं। (वा.रा. १/५६/१८)

अंतत: ब्रह्मबल के आगे विश्वामित्र का भौतिक बल और महादेव जी द्वारा दिए गये अस्त्रों तक का बल नहीं टिक पाया तथा विश्वामित्र को शर्मिन्दगी उठानी पड़ी, स्वयं कहना पड़ा-

‘धिग् बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजोबलं बलम्।।’

वा.रा. १/५६/२३।।

कि मेरे क्षत्रिय बल को धिक्कार है, वास्तव में ब्रह्मबल ही वास्तविक बल है। इस प्रकार ब्रह्मबल के न जाने और कितने पौराणिक तथा इस काल के उदाहरण हैं।

वेद भगवान् कहते हैं-

यत्प्राणेन न प्राणिनि येन प्राण: प्रणीयते।
तदेव ब्रह्मत्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते।।
केनोपनिषद् १/८

जिस अलौकिक, अदृश्य तत्व या शक्ति के द्वारा प्राणों का प्रीणन (पोषण) होता है वही ब्रह्म है। इसीलिए तैत्तरीमोपनिषद् अनु. ३/१ में- ‘प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्।’ कहा गया है अर्थात् प्राणों को ब्रह्म ही जानो।

इस प्रकार शरीर में जो ‘प्राणबल’ है वह ‘ब्रह्मबल’ है।

भौतिक विज्ञान के अनुसार बल वह कारक है जो किसी वस्तु की प्रारम्भिक अवस्था में परिवर्तन करता है या परिवर्तन करने की चेष्टा करता है। आप जानते हैं कि बल को अंग्रेजी में फोर्स कहते हैं। बल को ही शक्ति, ऊर्जा पावर भी कहते हैं। वैदिक चिकित्सा विज्ञान आयुर्वेद में आचार्य चरक ने शरीर के तीन प्रकार का बल बताये हैं-

त्रिविधं बलमिति सहजं, कालजं युक्तिकृतं च।।
च.सू. ११/३६।।

अर्थात् सहज, कालज और युक्तिकृत बल। ‘बल’ एक ऐसा शब्द है जो किसी के साथ जुड़ने पर उसके शक्ति सम्पन्नता की अभिव्यक्ति करा देता है। इसीलिए हम शरीर, आत्मा, धन, जन, ब्रह्म और प्राण आदि शब्दों के साथ ‘बल’ जोड़ देते हैं। इनमें से ब्रह्मबल या प्राणबल का उत्कृष्ट स्थान है। क्योंकि प्राणबल की असीमित सामथ्र्य होती है इसे मौलिक ऊर्जा भी माना जाता है।

प्राणबल सम्पन्न व्यक्ति प्राणवान् होते हैं। उसकी संकल्पशक्ति इतनी प्रबल होती है कि उसका कोई विकल्प नहीं होता।

भगवान् राम चित्रकूट में निवास करने के पश्चात् वन यात्रा में जैसे ही आगे निकलते हैं तो उन्होंने हड्डियों के ढेर को देखकर ऋषि-मुनियों से पूछा कि यह क्यों? तो मुनियों ने बताया-

निसिचर निकर सकल मुनि खाये।
सुनि रघुवीर नयन जल छाये।।
(रामचरित मानस अरण्यकाण्ड)

भगवन्! निशाचरों ने इस क्षेत्र के सभी ऋषि-मुनियों को खा डाला और भय फैलाने के लिए हड्डियों का ढेर लगा दिया है। तब प्रभु राम ने भुजा उठाकर प्रण किया कि-

निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाई पन कीन्ह।।
रामचरित मानस अरण्यकाण्ड

अर्थात् मैं इस पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर दूँगा। प्रभु श्रीराम जी ने प्रण पूरा किया क्योंकि उनमें ‘प्राणबल’ है। आज हम इसी प्राणबल की चर्चा करेंगे। इसे कुछ लोग जीवनशक्ति (विटल फोर्स) भी कहते हैं।

‘‘आयु, बल, वर्ण, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, उत्साह, उपचय, प्रभा, शारीरिक कांति, ओज, तेज, अन्य अग्नियाँ, प्राण सभी देहाग्नि बल पर आधारित हैं। जब यह अग्नि शांत हो जाती है तो व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। यह अग्नि उपयुक्त रहे तो व्यक्ति दीर्घायु और स्वस्थ जीवन जीता है, विकृत हो जाय तो व्यक्ति रोगी हो जाता है इसलिए अग्नि ही जीवन का मूल कारण है। च.चि. १५/३-४।।’’

विश्व के महान् शल्य वैज्ञानिक आचार्य सुश्रुत ने जब गर्भव्याकरण शरीर (द डिटेल्स ऑफ फोटल एनाटॉमी) पर व्याख्यान करना प्रारम्भ किया तो उन्होंने सबसे पहले यही बताया कि -

अग्नि: सोमो वायु: सत्त्वं रजस्तम: पञ्चेन्द्रियाणि भूतात्मेति प्राणा:।। सु.शा. ४/३।। अर्थात् अग्नि, सोम, वायु, सत्त्व, रज, तम, कर्ण, त्वक्, नेत्र, जिह्वा, नासा ये पाँच इन्द्रियाँ और भूतात्मा ये प्राण हैं।

इनको बलवान बनाकर मानव प्राणबल सम्पन्न हो जाता है। प्राण बल से ही असमान्य, असाधारण, विशिष्ट, कर्मठ, पुरुषार्थी, देवमानव स्तर का निर्माण होता है। प्राणबल में असीमित क्षमता होती है ऐसा इसलिए होता है कि प्राणबल सीधे ब्रह्मबल से जुड़ जाता है।

अग्नि, सोम, वायु, सत्त्व, रज, तम, कर्ण, त्वक्, नेत्र, जिह्वा, नासा ये पाँच इन्द्रियाँ और भूतात्मा ये प्राण हैं, इनके बल का संरक्षण और संवर्धन करके प्रत्येक मानव को प्राणबल सम्पन्न हो जाता है। प्राण बल से ही असमान्य, असाधारण, विशिष्ट, कर्मठ, पुरुषार्थी, देवमानव स्तर का निर्माण होता है। क्योंकि प्राणबल में असीमित क्षमता होती है

प्राणबल के पोषण, अभिवृद्धि और संरक्षण पर जब चर्चा हो तो इसके लिए सबसे पहले ‘अग्नि’ के समत्व और संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि शरीर में अग्नितत्व ही तो शक्ति है, ऊर्जा है। इसीलिए आचार्य सुश्रुत ने प्राणों की गणना करते समय अग्नि को प्रथम उल्लिखित किया है।

‘अग्नि’ बल पर आचार्य चरक कहते हैं कि-

‘‘आयु, बल, वर्ण, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, उत्साह, उपचय, प्रभा, शारीरिक कांति, ओज, तेज, अन्य अग्नियाँ, प्राण सभी देहाग्नि बल पर आधारित हैं। जब यह अग्नि शांत हो जाती है तो व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। यह अग्नि उपयुक्त रहे तो व्यक्ति दीर्घायु और स्वस्थ जीवन जीता है, विकृत हो जाय तो व्यक्ति रोगी हो जाता है इसलिए अग्नि ही जीवन का मूल कारण है। च.चि. १५/३-४।।’’

यदि अग्नि सम (युक्त) है तो उसके परिरक्षण में सचेत रहना चाहिए। इसके लिए आचार्य चरक बताते हैं-

तस्मात् तं विधिवद्युत्तैरन्नपानेन्धनैर्हितै:।
पालयेत् प्रयतस्तस्य स्थितौ ह्यायुर्बल स्थिति:।।
च.चि. १५/४०।।

कि अग्नि का ईधन आहार से मिलता है इसलिए आहार का सेवन पूरी तरह विधि पूर्वक और उचित तरीके से करना चाहिए। उचित तरीके और विधि पूर्वक किये गये भोजन से पाचकाग्नि की रक्षा होती है परिणामत: शारीरिक बल और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।

प्राणबल के पोषण, वृद्धि और संरक्षण के लिए सबसे पहले ‘अग्नि’ के समत्व और संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि आचार्य सुश्रुत ने अग्नि को प्राणों में प्रथम कहा है। यदि अग्नि सम है तो उसका परिरक्षण करना चाहिए। अग्नि का एक नाम जाठर है। इसे भगवान् और ईश्वर भी कहा जाता है।

किन्तु आज स्थिति उलट गयी है, बच्चा धरती में आते ही खाने-पीने की खोज करना और खाना-पीना भी सीख जाता है पर आहार का सही तरीका और विधि विधान वह जीवनभर नहीं सीख पाता। परिणामत: अग्निबल दुर्बल और विकृत होता जाता है, परिणामत: प्राणबल सम्यक् नहीं हो पाता।

यदि अग्नि की विषमता है तो वातज (तंत्रिका तंत्र) विकार, पेट में उदावर्त, कभी कब्ज, कभी दस्त, कभी भूख, कभी भूख की कमी, कभी प्रसन्नता तो कभी अवसाद ऐसे लक्षण आते हैं। यदि अग्नि की तीक्ष्णता है तो पित्त सम्बन्धी विकार, खून की खराबी, दाह, क्रोध, आँखों में लालिमा, मुखपाक, पेशाब में जलन।

अग्नि यदि मन्द है तो भूख न लगना, भारीपन और पीड़ा, उत्साहहीनता, आलस्य, कब्ज, आँव, पेचिश आदि शारीरिक और मानसिक समस्यायें होती हैं। यदि अग्नि का समत्व है तो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य सब चकाचक।

अथर्ववेद में अग्नि के सम्बन्ध में बताया गया है-

‘‘येऽग्नयोऽसु ये वृत्रे ये पुरुषे येऽश्मसु आविवेश ओषधीर्यो वनस्पतीस्तेभ्यो हुतमस्त्वेतत्।।’’

अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अग्नि व्याप्त है, प्राणी-प्राणी में, पत्ते-पत्ते में, कण-कण में अग्नि व्याप्त है

अग्नि का ज्वलन (इंटीमेशन) और पालन (प्रिजर्वेशन) पर सुश्रुत कहते हैं-

प्राणापान समानैस्तु सर्वत: पवनैस्त्रिभि:।
ध्मायते पाल्यते चापि स्वां स्वां गतिमनस्थितौ।।
सु.सू. ३५/२८।।

जिस प्रकार बाह्य/सांसारिक अग्नि, वायु की सहायता से ही ज्वलित संरक्षित और पलित रहती है, उसी प्रकार अन्तराग्नि (जठराग्नि) को भी प्राणवायु, अपानवायु और समानवायु अपने-अपने स्थानों और अपने-अपने कार्यों में स्थित रहते हुए संतुलित रखती है।

आचार्य सुश्रुत ने अग्नि के संरक्षण क्रम में बताया है कि यदि प्रात:काल भोजन करने के बाद दूसरे समय भोजन के लिए कड़ी भूख न लगे तो दुबारा (सायंकाल) भोजन न करें यदि ऐसे करेंगे तो इससे अग्निबल आहत होता है परिणामत: प्राणबल घटता है। (सु.सू. ४६/४९१)

यदि कोई आहार हल्का हो, सुपाच्य हो तो अधिक मात्रा में न खायें और गरिष्ठ आहार लेने में तो बहुत सावधानी रखें। (सु.सू. ४६/४९२)

भोजन के बाद अधिक जल या तरल पीना, एक ही स्थान पर अधिक देर तक बैठे रहना, आग के समीप रहना, धूप में फिरना, तैरना, नहाना, वाहन में बैठना, हानिप्रद है।

सुश्रुत (सू. ४६/४९९-५०) कहते हैं कि कई लोगों की शिकायत रहती है कि कई बार उचित मात्रा में लिया गया, उचित विधि से, लिया उचित आहार भी नहीं पचता, इसका कारण यह है कि अधिक तरल या जल पीने, विषम भोजन करने, मल, मूत्र, नींद, छींक, वमन, अपानवायु, आँसू आदि का वेग धारण करने, सोने की अस्त-व्यस्तता के कारण आहार नहीं पचता।

ऐसे ही यदि मनविकारग्रस्त है, ईष्र्या, भय, क्रोध, लोभ, शोक, दीनता और प्रद्वेष से पीड़ित है तो समझ लीजिए कि पाचन तंत्र मन्द और शिथिल ही रहेगा।

इसी तरह मानसिक अपवित्रता और विकारों से भी प्राणवायु, अपानवायु और समानवायु की क्रिया और कार्य बिगड़ते हैं। ये तीनों वायु ही अग्नि के सहायक हैं ऐसे में अग्निबल भी कमजोर होगा। परिणामत: प्राणबल या ब्रह्मबल कमजोर होगा।

इसीलिए अग्नि को आचार्य सुश्रुत ने भगवान् और ईश्वर कहा है-

जाठरो भगवानाग्निरीश्वरोऽन्नस्य पाचक:।
सौक्ष्म्याद्रसनाददानो विवेत्तुंâ नैव शक्यते।।
सु.सू. ३५/२७।।

कई बार उचित मात्रा में लिया गया, उचित विधि से, लिया उचित आहार भी नहीं पचता, इसका कारण यह है कि अधिक तरल या जल पीने, विषम भोजन करने, मल, मूत्र, नींद, छींक, वमन, अपानवायु, आँसू आदि का वेग धारण करने, सोने की अस्त-व्यस्तता के कारण आहार नहीं पचता। ऐसे ही यदि मनविकारग्रस्त है, ईष्र्या, भय, क्रोध, लोभ, शोक, दीनता और प्रद्वेष से पीड़ित है तो समझ लीजिए कि पाचन तंत्र मन्द और शिथिल ही रहेगा।

अग्नि की उत्पत्ति और स्थिति उदर से है यह भगवान् है, ईश्वर है, आहार का पाचक भी है, यह रसों का आदान कर्म करती है। यह इतना सूक्ष्म है कि जिस प्रकार ईश्वर की विवेचना संभव नहीं है वैसे ही अग्नि की विवेचना संभव नहीं है।

अग्निबल व्यवस्थित रखने के लिए ऋतु, अपनी शारीरिक अवस्था, शारीरिक प्रकृति, कार्य की प्रकृति, देश, स्वभाव और पाचनशक्ति को ध्यान में रखते हुए सही तरीके, पवित्र भावनाओं, सम आहार का वह भी नियम पूर्वक सेवन करना चाहिए।

जैसा कि आपने ऊपर पढ़ा कि मानसिक विकार ग्रस्तता भी पाचन प्रणाली को दूषित कर अग्निबल को कमजोर करती है। इसके लिए मन को समत्व में लाना होगा, अग्नि को भगवान् और ईश्वर कहा गया है इसलिए ईश्वरप्राणिधान से मन शीघ्र विकारों से मुक्त होकर समत्व में स्थित होने लगता है-

इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं स्थितं मन:।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिता:।।
श्रीमद्भगवद् गीता ५/१९।।

समत्व में स्थित मन ही विजय प्रदान करता है और ब्रह्मबल देता है।

ईश्वर की उपासना, भगवन्नाम स्मरण या गुरुप्रदत्त मंत्र जप, भगवान् के रूप का ध्यान, भगवान् की लीला, कथाओं के श्रवण से भी मन साम्यावस्था में आने लगता है। फिर मन और वायु का परस्पर सम्बन्ध होने से (‘प्रणेता च मनसा:।’- चरक) वायु समत्व में आ जाता है, वायु के समत्व से अग्नि का समत्व होता है फिर प्राणबल बढ़ने लगता है।

आधुनिक अनुसंधानों में भी पाया गया है कि ये मनोविकार पाचन करने वाले एंजाइम्स को असंतुलित करते हैं।

क्रमश: