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जीवन का सही उद्देश्य- - ऋण उतारे बिना कल्याण सम्भव नहीं!!

प्रत्येक जीवन का उद्देश्य स्थायी सुख की चाह है किन्तु सुख की प्राप्ति का आधार धर्माचरण है। यह बात वाग्भट्टाचार्य अपने शब्दों में इस प्रकार कहते हैं-

सुखार्था: सर्वभूतानां मता: सर्वा: प्रवृत्तय:।
सुखं च न विना धर्मात्त्स्माद्धर्मपरो भवेत्।।

अ.हृ.सू. २०/२।।

किन्तु कोई केवल मोक्ष प्राप्ति या आत्म साक्षात्कार को ‘धर्माचरण’ मानकर साधनामय जीवन जी रहा है और राष्ट्र, समाज की अनदेखी कर रहा है, मानवता की सेवा में, समय, शरीर, मन नहीं दे रहा है या उसकी कोई चिंता नहीं कर रहा है तो उसकी साधना सफल नहीं हो सकती, बल्कि जीवन निरुद्देश्य हो जाता है।

भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि-

न मे पार्थास्ति कर्तव्य त्रिषु लोकेषु किंचन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।।

श्रीमद्भगवद्गीता ३/२२

अर्जुन! इन तीनों लोकों में न तो मेरे लिए कोई कर्तव्य है और न ही कुछ भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है फिर भी मैं (लोक कल्याणकारी) कर्म में ही बरतता हूँ। भगवान् राम कहते हैं-

बल बिवेक दम परहित घोरे।।

रामचरित मानस।।

अर्थात् विजयशील रथ के ४ घोड़े हैं बल, विवेक, दम और परोपकार।

हम अपना जीवन चलाने के लिए इस प्रकृति से, इस समाज से बहुत अधिक सेवा लेते हैं, बदले में उसे वापस भी करना ही होता है क्योंकि यह ऋण है और ऋण उतारना ही पड़ता है। ऋणानुबन्धन ऐसा अनुबन्ध है कि यदि आप समाज, राष्ट्र, माता-पिता, गुरु का ऋण लादे परलोक चले जाते हैं तो आपको कोई न कोई जन्म लेकर न चाहते हुए भी ऋण चुकाना ही पड़ेगा, वही दु:ख और बन्धन का कारण बनता है। भगवान् गीता में कहते हैं कि उस व्यक्ति को कर्म करने की आवश्यकता नहीं है जिसका सभी प्राणियों से भी किंचिन्मात्र भी अपने शरीर इन्द्रियों का उपयोग सम्बन्ध नहीं होता। (३/१८)

इस सम्बन्ध में गीता की एक बात जो हमें बहुत अच्छी लगती है वह यह है कि-

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसास्मरन्।
इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचार: स उच्यते।।

३/६

इसीलिए हमारे यहाँ जितने अच्छे साधक हुए जिन्होंने समाज से भोजन, वस्त्र, सेवा आदि लिया तो वे समाज के लिए निरन्तर कर्म करते रहे और करते हैं। तपस्या का या साधुता का बहाना लेकर केवल समय नहीं बिताते रहे, प्रपंच में स्वयं नहीं लगते न दूसरों को लगाते।

समाज से जितना लेते हैं उससे अधिक जब आप देते हैं तो उसका ब्याज आपको प्राप्त होगा। अब ब्याज आपको स्वीकारना है या नहीं यह विशेषाधिकार आपका है। लेकिन ऋण चुकाने में ऐसा कोई विशेषाधिकार नहीं है। इसीलिए हमारे देश के प्राज्ञ पुरुष किसी का भी अनावश्यक अन्न (भोजन), वस्त्र, दान नहीं स्वीकारते थे। बहुत सधकर ग्रहण करते थे, कन्या/पुत्री धान्य को तो बहुत बचाते थे। वे ऋणानुबन्ध से डरते थे।

आप इस धरती में आये हैं, धरती और उसमें स्थित प्राणियों की सेवा करने के लिए साथ-साथ साधना करके मोक्ष प्राप्त करने के लिए या अगला जन्म अच्छा प्राप्त करने के लिए। ऐसे में यदि आप केवल साधना में लगे रहेंगे, सेवा से दूर रहेंगे, समाज में आपकी उपयोगिता हो, इससे दूर रहेंगे तो साधना में अच्छी प्रगति नहीं हो सकती। क्योंकि साधना और निष्काम सेवा एक दूसरे के पर्याय हैं। हमेशा ध्यान रहे कि सेवा निष्काम हो, फल की इच्छा न हो।

मानव एक विचारवान् प्राणी है, विचारवान् मन केवल मानव को ही मिला है इसलिए जीवन में वैचारिक प्रवाह रहता है। प्रत्येक के जीवन में एक आदर्श होना चाहिए उस आदर्श की ओर उन्मुखता ही हमें मानव बनाती है। जिसके जीवन में कोई आदर्श नहीं है न आदर्श की उन्मुखता है ऐसा व्यक्ति मानव लोक में होते हुए भी मानव नहीं हो सकता।

भारत के चिकित्सा शास्त्र आयुर्वेद के ऋषि चरक कहते हैं-

सर्वप्राणिषु बन्धुभूत: स्यात्।।

सू.८/१८।।

अर्थात् सभी प्राणियों के प्रति बन्धुभूत बर्ताव करना चाहिए। तभी आत्मकल्याण संभव है। चाणक्याचार्य कह देते हैं कि जो सभी प्राणियों में अपने को देखता है वही तो वास्तविक विद्वान्, विवेकी, पंडित और ज्ञानी हैं। ऐसी भावना बना लेने से, ऐसी वृत्ति का निरन्तर अभ्यास करने से अपने अन्दर के सभी दुर्गुण जैसे ईष्र्या, द्वेष, मात्सर्य स्वत: मिटते जाते हैं और निश्छल प्रेम का अविर्भाव होता है जो ईश्वर प्राप्ति का संकेत है।